Thursday, February 4, 2010

मुंबई जाना तो मराठी मानुष बनके

16वीं शताब्दी में मुंबई पुर्तगाली राजकुमारी को दहेज में मिली थी। उसके बाद जाने कब यह ठाकरे परिवार के पास आ गई। ये हमारा वहम है कि हम लोकतांत्रिक देश का हिस्सा हैं। जब चाहे, जहाँ चाहे आ-जा सकते हैं। पर कृपया अपने इस ‘कहीं भी‘ की सूची से मुंबई को निकाल दें। गलतफहमी को पाले रखना कोई समझदारी की बात नहीं। मुंबई जाने के लिये आपको हिन्दू (शिवसेना की परिभाषा के अनुसार) होना चाहिये, मराठी आनी चाहिये और एक प्रमाणपत्र साथ होना चाहिये कि आपने ठाकरे बंधुओं के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा है, साथ ही शपथ पत्र भी कि आप आगे भी कुछ नहीं कहेंगे। पर रूकिये। कहीं आप यूपी या बिहार से तो नहीं आ रहे। यदि हाँ, तो चाहे आपके पास कुछ भी हो, आपकी मुंबई में ‘एन्ट्री‘ निषेध है। इस नियम के कुछ अपवाद हैं जिनपर आप प्रश्न नहीं उठा सकते, जैसे मुसलमानों का मुंबई में स्वागत नहीं है पर यदि वे सेलिब्रिटी हैं तो ‘ मातोश्री‘ में जा सकते हैं। उत्तर भारतीय फिल्म स्टार से भी ठाकरे साहब को कोई एलर्जी नहीं है। हिंदी भाषी गंगा किनारे के छोरे अमिताभ बच्चन के वे मुरीद हैं।उत्तर भारतीय सब्जी बेचें या सुबह दूध लाकर दें तो ‘भैयाजी‘ बहुत अच्छें हैं। पर भैयाजी का बेटा अफसर बन गया तो ठाकरे साहब की भौं टेढ़ी हो जाती है। कुछ तो बात है साहब में कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी दिल्ली से बयान तो मार देते हैं पर मुंबई जाकर उन्हें ठाकरे की ठोकरों से नहीं बचा पाते। ठाकरे जैसे शेर पर तो उनका क्या बस चलता पर वे तो अपने मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को भी ठाकरे की भाषा बोलने से नहीं रोक पाये। आज शिवसैनिक तय करते हैं कि मुबई में कौन रह सकता है और उसे क्या काम करने की इजाज़त है। शाहरूख जैसे बड़े स्टार को खुली धमकी कि ‘मन्नत‘ मुंबई में है पाकिस्तान में नही, देने वाले क्या किसी आतंकवादी से कम हैं।
तो आपने मेरी चेतावनी को गंभीरता से लिया या नहीं। मुंबई जाना तो मराठी मानुष बनके वरना आपका मालिक ठाकुर नहीं ठाकरे है, याद रखिये।

3 comments:

महफूज़ अली said...

आलेख बहुत अच्छा लगा...

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

यह ठाकरे वोटो की तुष्टीकरण का ही निम्न उधारण प्रतीत होता है . एक भाषायी दानव जिसे भाजपा से भी शक्ति प्राप्त है . कुछ तो किजिये

डॉ. मनोज मिश्र said...

सत्य और सामयिक चिंतन ..

Post a Comment