खुशिया ईद मुबारख की हो अथवा गणपति पूजा की दोनों पर्वो के उल्लास में आज पूरा देश डूबा हुआ है ! हर पर्व और त्यौहार हमारे लिए जिस आनंद का अवसर प्रदान करते हैं उसमे समाज की सभी विषमताए समाप्त सी हो जाती है ! अमीर गरीब बाल बर्द्ध स्त्री पुरुष सभी बिना किसी भेद भाव के उस अवसर का पूरा आनंद उठाते हैं इन त्योहारों की ख़ुशी में संसाधनों का कोई महत्व नहीं रह जाता हैं धन और साधन की सीमए सिकुड़ जाती हैं और आत्मीयता के खुले आकाश के नीचे हर कोई उन्मुक्त आनंद का भागीदार बन जाता है कदाचित हम अपने मन की खुलती ग्रंथियों को एक झटके से अलग कर सके और केवल आनंद के हर अवसर पर जगत पंथ भाषा और छेत्रिये संकीर्णता से उपर उठ कर एकात्मक हो सकें ईद के सेबेयों की मिठास और गणपति पूजा के मोदकों की मादकता को अपने नित्य के जीवन में स्थान दे सके तो कितना अच्छा हो
Wednesday, August 31, 2011
पर्वो का उद्देश्य
Posted by
स्वामी चिन्मयानन्द
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10:11 AM
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2 comments:
@@अपने नित्य के जीवन में स्थान दे सके तो कितना अच्छा हो ...........
बहुत सुंदर,सहमत.
बहुत सुंदर
डॉ.नागेश पांडेय'संजय'के बालसाहित्य का अनोखा संसार
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